बस यूँ ही

Life and tyranny.

dr.nagesh pandey's avatarवेदना – समवेदना

कितना आसान होता है कह देना

सहना,जितना कठीन भी नहीं ।

समय परिस्थितियॉं सब चल रहें हैं

अपने वेग और प्रवाह मे

कौन रूकता है यहॉं किसी के लिए,

बचपन से सिर्फ़ संस्कार ही ढोते आया

क्या लोग बदल रहे है ?

या बदल घट रहा है मेरी सोच में ,

खोजता रहा अपनेपन , वास्तविकता

और ज़रूरत की वजह….

बेमानी हो जाता है सारा वजूद

जब ज़िन्दगी किसी रेड लाईट इलाक़े

के चौराहे की तरह हो जाती है

जहॉं प्यार भी ,

जेब की औक़ात से नापा जाता है।

सिर्फ़ सपनों मे मुझे दिखाई पड़ते है रिश्ते ,

अपने पन का एहसास भी बेहोशी मे ही

हो पाता है अब ,

ऐसा क्यों ?

कभी उस किसान की मनोदशा मे

होता है मन,

पथरा जाती हैं , जिसकी आँखें

बारिश के इंतज़ार मे ।

और बारिश !

सरकारीतंत्र की तरह,

बरसता भी वहीं है ,

जहॉं ज़रूरत नहीं ।

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