Life and tyranny.
कितना आसान होता है कह देना
सहना,जितना कठीन भी नहीं ।
समय परिस्थितियॉं सब चल रहें हैं
अपने वेग और प्रवाह मे
कौन रूकता है यहॉं किसी के लिए,
बचपन से सिर्फ़ संस्कार ही ढोते आया
क्या लोग बदल रहे है ?
या बदल घट रहा है मेरी सोच में ,
खोजता रहा अपनेपन , वास्तविकता
और ज़रूरत की वजह….
बेमानी हो जाता है सारा वजूद
जब ज़िन्दगी किसी रेड लाईट इलाक़े
के चौराहे की तरह हो जाती है
जहॉं प्यार भी ,
जेब की औक़ात से नापा जाता है।
सिर्फ़ सपनों मे मुझे दिखाई पड़ते है रिश्ते ,
अपने पन का एहसास भी बेहोशी मे ही
हो पाता है अब ,
ऐसा क्यों ?
कभी उस किसान की मनोदशा मे
होता है मन,
पथरा जाती हैं , जिसकी आँखें
बारिश के इंतज़ार मे ।
और बारिश !
सरकारीतंत्र की तरह,
बरसता भी वहीं है ,
जहॉं ज़रूरत नहीं ।
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